शनिवार, १२ एप्रिल, २००८

"मी माझा" मात्र ऎका दारुड्याच्या नजरेतुन

"मी माझा" हे फक्त नावचं पुरेस आहे सर्वांनी वाचले असेलच,
सादर आहे "मी माझा" मात्र ऎका दारुड्याच्या नजरेतुन
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आपण किती प्यायची
ते आपणच ठरवायचं,
एकाला चढली तर
दुस-याने सावरांयच

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आपण पीत असतांना
तु बाटली मागवली
तु तसाच राहिला
मला मात्र चढली

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परवा एक बेवडा
आपलं पाकीट शोधत राहिला
कसं सांगु त्याच पाकीट
मारतांना मी दुसरा बेवडा पाहिला.

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सगळीच बीअर-बार
दुरुन छान दिसतात
आत गेल्यावर कळतं
ती किती गजबजलेली असतात.

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प्रत्येकाला एक घर असावे
घरी परतण्यासाठी
प्रत्येक घराला एक ऒसरी असावी
रात्री पिउन आल्यावर बायकोनी घरात घेतले नाही,तर बाहेर झॊपण्यासाठी

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दारुचे दुकान कुठेही असते
कुठेही असते
तरी जोरात चालते

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तु सोबत दिली तर
पिण्यात अर्थ आहे,
माझ्यासाठी थम्स अप,
तर तुझंसाठी सोडा आहे
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मरेल म्हणुन मी
पिणं थांबवलं
तर मलाच वाटतं मी
मरण उगीचच लांबवल

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तु पिउन पडत असतांना
मी तुझ्याकडे धावलो ते
तुला सावरायला नव्हे, सोबतीला,
नाहीतर मला तरी कुठे येतय सावरायला

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आता एक नंबर
>>>
पाजणार कोणी असेल
तर पिण्यात अर्थ आहे,
स्वत:च्या पैश्याने प्यायला
आम्ही काय मुर्ख आहे?

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- नागेश देशपांडे

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